* हर वर्ण की अपनी लिपि होती है। लिपि को वर्ण-संकेत भी कहते हैं।
* हिन्दी वर्णमाला में कुल 52 वर्ण होते है।
* वर्णमाला में मुख्य रूप से 42 वर्ण होते है।
* वर्णमाला में संयुक्त रूप से 46 वर्ण होते है।
वर्णमाला :- वर्णों के समूह को वर्णमाला कहते हैं।
Note- प्रत्येक भाषा की अपनी वर्णमाला होती है।
* हिंदी - अ, आ, क, ख, ग.....
* अंग्रेजी - A, B, C, D, E....
स्वर (Vowel) :- वैसे सभी वर्ण जिनके उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता नहीं ली जाए उसे स्वर वर्ण कहते है।
* इसके उच्चारण में कंठ, तालु का उपयोग होता है, जीभ, होठ का नहीं।
* संस्कृत वर्णमाला में 16 स्वर है|
जैसे- अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ॠ ऌ ॡ।
* वर्णमाला में कुल स्वर वर्ण 13 है|
जैसे- अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ।
* हिंदी वर्णमाला में मुख्य रूप से 11स्वर है|
जैसे- अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ ऋ
* अयोगवाह दो होते है| जैसे- अं अः
स्वर वर्ण उच्चारण के समय की दृष्टि से(4)
Flow Chart
|
1. ह्रस्व स्वर/ मूल स्वर - 4 कम-से-कम समय (जैसे- अ, इ, उ, ऋ) |
|
2. दीर्घ स्वर - 3 ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय जैसे- आ, ई, ऊ) |
|
3 संयुक्त स्वर - 4 दो विजातीय स्वरों के मेल (जैसे- अ+इ = ए, अ+ए = ऐ, अ+उ = ओ, अ+ओ = औ) |
|
4. प्लुत स्वर/ त्रिमात्री स्वर दीर्घ स्वरों से भी अधिक समय जैसे- ऽ (ओऽऽम्) |
Definition Formate परिभाषा का प्रारूप
जिन स्वरों के उच्चारण में ......... समय लगता हैं उन्हें ......... कहते हैं।
1. ह्रस्व स्वर/ मूल स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में कम-से-कम समय लगता हैं उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं।
जैसे- अ, इ, उ, ऋ
2. दीर्घ स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगता है उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं।
जैसे- आ, ई, ऊ
3. संयुक्त स्वर- दो विजातीय स्वरों के मिलने से जो स्वर बनते है, उन्हें संयुक्त स्वर कहते है।
जैसे- ए, ऐ, ओ, औ
4. प्लुत स्वर - जिन स्वरों के उच्चारण में दीर्घ स्वरों से भी अधिक समय लगता है उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं। प्रायः इनका प्रयोग दूर से बुलाने में किया जाता है।
जैसे- ऽ (ओऽऽम्)
स्वर के दो भेद होते है-
(i) मूल स्वर (ii) संयुक्त स्वर
मूल स्वर के तीन भेद होते है -
(i) ह्रस्व स्वर (ii) दीर्घ स्वर (iii) प्लुत स्वर
ह्रस्व स्वर:- जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है उन्हें ह्स्व स्वर कहते है।
* 'ऋ' की मात्रा (ृ) के रूप में लगाई जाती है तथा उच्चारण 'रि' की तरह होता है।
आयोगवाह:- अं और अः को अयोगवाह कहते हैं।
वर्णमाला में इनका स्थान स्वरों के बाद और व्यंजनों से पहले होता है। अं को अनुस्वार तथा अः को विसर्ग कहा जाता है।
टिप्पणी- अनुस्वार और विसर्ग न तो स्वर हैं, न व्यंजन; किन्तु ये स्वरों के सहारे चलते हैं। स्वर और व्यंजन दोनों में इनका उपयोग होता है।
जैसे- अंगद, रंग।
इस सम्बन्ध में आचार्य किशोरीदास वाजपेयी का कथन है कि ''ये स्वर नहीं हैं और व्यंजनों की तरह ये स्वरों के पूर्व नहीं पश्र्चात आते हैं, ''इसलिए व्यंजन नहीं। इसलिए इन दोनों ध्वनियों को 'अयोगवाह' कहते हैं।'' अयोगवाह का अर्थ है- योग न होने पर भी जो साथ रहे।
अनुनासिक, निरनुनासिक, अनुस्वार और विसर्ग
अनुनासिक, निरनुनासिक, अनुस्वार और विसर्ग- हिन्दी में स्वरों का उच्चारण अनुनासिक और निरनुनासिक होता हैं। अनुस्वार और विर्सग व्यंजन हैं, जो स्वर के बाद, स्वर से स्वतंत्र आते हैं। इनके संकेतचिह्न इस प्रकार हैं।
अनुनासिक (ँ) - ऐसे स्वरों का उच्चारण नाक और मुँह से होता है और उच्चारण में लघुता रहती है।
जैसे- गाँव, दाँत, आँगन, साँचा इत्यादि।
अनुस्वार ( ं) ) यह स्वर के बाद आनेवाला व्यंजन है, जिसकी ध्वनि नाक से निकलती है।
जैसे- अंगूर, अंगद, कंकन।
निरनुनासिक- केवल मुँह से बोले जानेवाला सस्वर वर्णों को निरनुनासिक कहते हैं।
जैसे- इधर, उधर, आप, अपना, घर इत्यादि।
विसर्ग( ः) - अनुस्वार की तरह विसर्ग भी स्वर के बाद आता है। यह व्यंजन है और इसका उच्चारण 'ह' की तरह होता है।
* संस्कृत में इसका अधिक प्रयोग होता है।
* हिन्दी में अब इसका अभाव होता जा रहा है; किन्तु तत्सम शब्दों के प्रयोग में इसका आज भी उपयोग होता है। जैसे- मनःकामना, पयःपान, अतः, स्वतः, दुःख इत्यादि।
अनुस्वार और अनुनासिक में अन्तर
|
अनुस्वार |
अनुनासिक |
|
अनुस्वार के उच्चारण में नाक से अधिक साँस निकलती है और मुख से कम| जैसे- अंक, अंश, पंच, अंग इत्यादि। |
अनुनासिक के उच्चारण में नाक से बहुत कम साँस निकलती है और मुँह से अधिक| जैसे- आँसू, आँत, गाँव, चिड़ियाँ इत्यादि। |
|
अनुस्वार एक व्यंजन ध्वनि है। अनुस्वार की ध्वनि प्रकट करने के लिए वर्ण पर बिन्दु लगाया जाता है। |
अनुनासिक स्वर की विशेषता है, अर्थात अनुनासिक स्वरों पर चन्द्रबिन्दु लगता है। |
|
तत्सम शब्दों में अनुस्वार लगता है| जैसे- अंगुष्ठ, दन्त, अन्त्र |
तत्सम से बने तद्भव रूपों में चन्द्रबिन्दु लगता है| जैसे- अँगूठा, दाँत, आँत |
व्यंजन वर्णों के उच्चारण में जिन स्वरमूलक चिह्नों का व्यवहार होता है, उन्हें 'मात्राएँ' कहते हैं।
ये मात्राएँ दस है; जैसे- ा े, ै ो ू इत्यादि।
ये मात्राएँ केवल व्यंजनों में लगती हैं|
जैसे- का, कि, की, कु, कू, कृ, के, कै, को, कौ इत्यादि।
स्वर वर्णों की ही हस्व-दीर्घ (छंद में लघु-गुरु) मात्राएँ होती हैं, जो व्यंजनों में लगने पर उनकी मात्राएँ हो जाती हैं। हाँ, व्यंजनों में लगने पर स्वर उपयुक्त दस रूपों के हो जाते हैं।
व्यंजन (Consonant):- वैसे सभी वर्ण जिनके उच्चारण में स्वर वर्ण की सहायता ली जाती है उन्हें व्यंजन कहते है।
जैसे- क, ख, ग, च, छ, त, थ, द, भ, म इत्यादि।
'क' से विसर्ग ( : ) तक सभी वर्ण व्यंजन हैं। प्रत्येक व्यंजन के उच्चारण में 'अ' की ध्वनि छिपी रहती है। 'अ' के बिना व्यंजन का उच्चारण सम्भव नहीं।
जैसे- ख्+अ=ख, प्+अ =प।
व्यंजन वर्ण का प्रकार (5)
Flow Chart
| व्यंजन वर्ण (Consonants) मूल-33 कुल -39 |
| 1. स्पर्श व्यंजन(25) - क वर्ग से प वर्ग |
| 2. अन्तस्थ व्यंजन(4) – य, र, ल, व |
| 3. ऊष्म व्यंजन (4) – श, ष, स, ह |
| 4. संयुक्त व्यंजन(4) – क्ष, त्र, ज्ञ, श्र |
| 5. अतिरिक्त / उत्क्षिप्त व्यंजन (2) – ड़, ढ़ |
श्वास (प्राण-वायु) की मात्रा के आधार पर वर्ण-भेद
1. अल्पप्राण
(वर्ग का विषम स्थान & अन्तःस्थ व्यंजन)
2. महाप्राण
(वर्ग का सम स्थान & ऊष्म व्यंजन)
|
अल्पप्राण ( वर्ग का विषम स्थान &अन्तःस्थ) उच्चारण में वायु की मात्रा कम होती है प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवाँ वर्ण अल्पप्राण व्यंजन हैं। |
महाप्राण ( वर्ग का सम स्थान & ऊष्म) उच्चारण में वायु की मात्रा अधिक होती है प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण तथा समस्त ऊष्म वर्ण महाप्राण हैं। |
NOTE- अल्पप्राण वर्णों की अपेक्षा महाप्राणों में प्राणवायु का उपयोग अधिक श्रमपूर्वक करना पड़ता हैं।
नाद की दृष्टि के आधार पर वर्ण-भेद
|
घोष व्यंजन (345 & अन्तःस्थ & ह):- उच्चारण में स्वरतन्त्रियाँ झंकृत होती हैं | 'घोष' में केवल नाद का उपयोग होता हैं प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ वर्ण, सारे स्वरवर्ण, य, र, ल, व और ह |
अघोष व्यंजन (12 & श, ष, स):- उच्चारण में स्वरतन्त्रियाँ झंकृत नहीं होती हैं | 'अघोष' में केवल श्र्वास का उपयोग होता हैं । प्रत्येक वर्ग का पहला, दूसरा और तीनों स क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स |
स्पर्श व्यंजन :- स्पर्श का अर्थ होता है -छूना। जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय जीभ मुँह के किसी भाग जैसे- कण्ठ, तालु, मूर्धा, दाँत, अथवा होठ का स्पर्श करती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते है।
इन्हें हम 'वर्गीय व्यंजन' भी कहते है; क्योंकि ये उच्चारण-स्थान की अलग-अलग एकता लिए हुए वर्गों में विभक्त हैं। वर्गीय व्यंजन 25 व्यंजन होते है|
अन्तःस्थ व्यंजन :- 'अन्तः' का अर्थ होता है- 'भीतर'। उच्चारण के समय जो व्यंजन मुँह के भीतर ही रहे उन्हें अन्तःस्थ व्यंजन कहते है।
ये व्यंजन चार होते है- य् र् ल् व्
इनका उच्चारण जीभ, तालु, दाँत और ओठों के परस्पर सटाने से होता है, किन्तु कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता। अतः ये चारों अन्तःस्थ व्यंजन 'अर्द्धस्वर' कहलाते हैं।
उष्म व्यंजन :- उष्म का अर्थ होता है- गर्म। जिन वर्णो के उच्चारण के समय मुँह से गर्म हवा निकलती है उसे उष्म व्यंजन कहते है।
ये भी चार व्यंजन होते है- श् ष् स् ह्
उष्म व्यंजनों का उच्चारण एक प्रकार की रगड़ या घर्षण से उत्पत्र उष्म वायु से होता हैं।
संयुक्त व्यंजन :- जो व्यंजन दो या दो से अधिक व्यंजनों के मेल से बनते हैं, वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं। ये संख्या में चार हैं :
| क्ष = क् + ष + अ = क्ष (रक्षक, भक्षक, क्षोभ, क्षय) |
| त्र = त् + र् + अ = त्र (पत्रिका, त्राण, सर्वत्र, त्रिकोण) |
| ज्ञ = ज् + ञ + अ = ज्ञ (सर्वज्ञ, ज्ञाता, विज्ञान, विज्ञापन) |
| श्र = श् + र् + अ = श्र (श्रीमती, श्रम, परिश्रम, श्रवण) |
संयुक्त व्यंजन में पहला व्यंजन स्वर रहित तथा दूसरा व्यंजन स्वर सहित होता है।
द्वित्व व्यंजन :- जब एक व्यंजन का अपने समरूप व्यंजन से मेल होता है, तो द्वित्व व्यंजन कहते हैं।
जैसे- क् + क = पक्का, च् + च = कच्चा
म् + म = चम्मच, त् + त = पत्ता
द्वित्व व्यंजन में भी पहला व्यंजन स्वर रहित तथा दूसरा व्यंजन स्वर सहित होता है।
संयुक्ताक्षर :- जब एक स्वर रहित व्यंजन अन्य स्वर सहित व्यंजन से मिलता है, तब वह संयुक्ताक्षर कहलाता हैं।
जैसे- क् + त = क्त = संयुक्त
स् + थ = स्थ = स्थान
स् + व = स्व = स्वाद
द् + ध = द्ध = शुद्ध